
मणमित्ते वावारे णट्ठुप्पण्णे य वे गुणा हुंति ।
णट्ठे आसवरोहो उप्पण्णे कम्मबंधो य ॥70॥
मनो मात्रे व्यापारे नष्टे उत्पन्ने च द्वौ गुणौ भवतः ।
नष्टे आस्रवरोधः उत्पन्ने कर्मबंधश्च ॥७०॥
क्षय, जीवित उस चित्त के, दो गुण हों उत्पन्न ।
एक कर्म आस्रव रुके, द्वितीय कर्म का बन्ध ॥७०॥
अन्वयार्थ : [मणमित्ते] मनोमात्र [वावारे] व्यापार के [णट्ठुप्पण्णे य] नष्ट तथा उत्पन्न होने पर [वे गुणा हुंति] दो गुण - दो कार्य होते हैं । [णट्ठे] नष्ट होने पर [आसवरोहो] आस्रव का निरोध - संवर [य] और [उप्पण्णे] उत्पन्न होने पर [कम्मबंधो] कर्मबन्ध होता है ।