+ शून्य मन द्वारा ही कर्म नष्ट -
परिहरिय रायदोसे सुण्णं काऊण णियमणं सहसा ।
अत्थइ जाव ण कालं ताव ण णिहणेइ कम्माइं ॥71॥
परिहृत्य रागद्वेषौ शून्यं कृत्वा निजमनः सहसा ।
तिष्ठति यावन्न कालं तावन्न निहंति कर्माणि ॥७१॥
राग-द्वेष को त्याग कर, कर निज मन को शून्य ।
तब तक ऐसे हो रहो, कर्म न जब तक क्षीण ॥७१॥
अन्वयार्थ : [जाव कालं] जब तक यह जीव [रायदोसे] राग और द्वेष को छोड़ कर [सहसा] शीघ्र ही [णियमणं] अपने मन को [सुण्णं] शून्य [काऊण] करके [ण अत्थइ] स्थित नहीं होता [ताव] तब तक [कम्माइं] कर्मों को [ण णिहणेइ] नष्ट नहीं करता ।