+ स्व-संवेदन ज्ञान की प्रधानता -
तणुवयणरोहणेहिं रुज्झंति ण आसवा सकम्माणं ।
जाव ण णिप्फंदकओ समणो मुणिणा सणाणेण ॥72॥
तनुवचनरोधनाभ्यां रुध्यंते न आस्रवाः स्वकर्मणाम् ।
यावन्न निष्पंदीकृतं स्वमनो मुनिना स्वज्ञानेन ॥७२॥
हो न चित्त निष्पन्द निज, पा जड़-चेतन बोध ।
तनु वाणी के रोध से, हो न कर्म का रोध ॥७२॥
अन्वयार्थ : [जाव] जब तक [समणो] अपना मन [मुणिणा] मुनि के द्वारा [सणाणेण] स्वसंवेदन ज्ञान से [ण णिप्फंदकओ] निश्चल नहीं कर लिया जाता [ताव] तब तक [तणुवयणरोहणेहिं] काय और वचन योग के रोकने मात्र से [सकम्माणं] आत्मा के साथ एकीभाव को प्राप्त हुए ज्ञानावरणादि आठ कर्मों के अथवा अपने-अपने निमित्त से बँधने वाले कर्मों के [आसवा] आस्रव [ण रुज्झंति] नहीं रुकते हैं ।