+ मन-प्रसार नष्ट होने का फल -
खीणे मणसंचारे तुट्टे तह आसवे य दुवियप्पे ।
गलइ पुराणं कम्मं केवलणाणं पयासेइ ॥73॥
क्षीणे मनःसंचारे त्रुटिते तथास्रवे च द्विविकल्पे ।
गलति पुरातनं कर्म केवलज्ञानं प्रकाशयति ॥७३॥
दोनों आस्रव दूर जब, क्षय हो मन व्यापार ।
कर्म पुरातन छूटते, प्रकटे ज्ञान अपार ॥७३॥
अन्वयार्थ : [मणसंचारे] मन का संचार [खीणे] क्षीण होने [तह] तथा [दुवियप्पे] शुभ-अशुभ अथवा द्रव्य और भाव के दो भेद से दो प्रकार का आस्रव [तुट्टे] टूट जाने पर [पुराणं कम्मं] पूर्वबद्ध कर्म [गलइ] नष्ट हो जाता है और [केवलणाणं] केवल ज्ञान [पयासेइ] प्रकट हो जाता है ।