
जइ इच्छहि कम्मखयं सुण्णं धारेहि णियमणो झत्ति ।
सुण्णीकयम्मि चित्ते णूणं अप्पा पयासेइ ॥74॥
यदीच्छसि कर्मक्षयं शून्यं धारय निजमनो झटिति ।
शून्यीकृते चित्ते नूनमात्मा प्रकाशयति ॥७४॥
चाहो यदि तुम कर्म क्षय, धरो शून्य में चित्त ।
शून्य चित्त में वेग से, प्रकटे आत्म पवित्र ॥७४॥
अन्वयार्थ : [जइ] यदि तू [कम्मखयं] कर्मों का क्षय [इच्छहि] चाहता है तो [णियमणो] अपने मन को [झत्ति] शीघ्र ही [सुण्णं] शून्य [धारेहि] धारण कर [चित्ते सुण्णीकयम्मि] मन के शून्य कर लेने पर [णूणं] निश्चित ही [अप्पा] आत्मा [पयासेइ] प्रकट हो जाता है ।