+ विषय-विमुख होने की प्रेरणा -
उव्वासहि णियचित्तं वसहि सहावे सुणिम्मले गंतुं ।
जइ तो पिच्छसि अप्पा सण्णाणो केवलो सुद्धो ॥75॥
उद्वासयसिं निजचित्तं वससि सद्भावे सुनिर्मले गंतुं ।
यदि तदा पश्यसि स्वात्मानं संज्ञानं केवलं शुद्धम् ॥७५॥
लगा न विषयों में हृदय, कर स्वभाव में वास ।
तो तू देखेगा स्वयं, केवलज्ञान प्रकाश ॥७५॥
अन्वयार्थ : [जइ] यदि तू [णियचित्तं] अपने मन को [उव्वासहि] विषयों से विमुखता को प्राप्त कराता है और [गंतु] परमात्मा को जानने के लिए [सुणिम्मले] अत्यन्त निर्मल [सहावे] समीचीन भाव से युक्त परमात्मा में [वसहि] निवास करता है [तो] तो [सण्णाणो] सम्यग्ज्ञान से तन्मय [केवलो] पर पदार्थों से असंपृक्त तथा [सुद्धो] समस्त उपाधियों से रहित [अप्पा] आत्मा को [पिच्छसि] देख सकता है ।