
तणुणवयणे सुण्णो ण य सुण्णो अप्पसुद्धसब्भावे ।
ससहावे जो सुण्णो हवइ यसो गयणकुसुणिहो ॥76॥
तनु नोवचने शून्यो न च शून्य आत्मशुद्धसद्भावे ।
स्वसद्भावे यः शून्यो भवति य स गगनकुसुम निभः ॥७६॥
तन, मन, वच से शून्य नर, नहिं स्वभाव से शून्य ।
गगन-कुसुम सम वह सभी, जो स्वभाव से शून्य ॥७६॥
अन्वयार्थ : क्षपक [तणुणवयणे] शरीर, मन और वचन के विषय में तो [सुण्णो] शून्य होता है, परन्तु [अप्पसुद्धसब्भावे] आत्मा के शुद्ध अस्तित्व में [ण य सुण्णो] शून्य नहीं होता । [जो] जो [ससहावे] स्वकीय आत्मा के सद्भाव में [सुण्णो] शून्य [हवइ] होता है [यसो] वह [गयणकुसुणिहो] आकाश के फूल के समान [हवइ] होता है ।