
सुण्णज्झाणपइट्ठो जोई ससहावसुक्खसंपण्णो ।
परमाणंदे थक्को भरियावत्थो फुडं हवइ ॥77॥
शून्यध्यानप्रविष्टो योगी स्वसद्भावसौख्यसंपन्नः ।
परमानंदे स्थितो भृतावस्थः स्फुटं भवति ॥७७॥
निर्विकल्प योगी निजी, भोगे सुख गुण युक्त ।
परमानन्द प्रसक्त वह, भरित कलश-सम तृप्त ॥७७॥
अन्वयार्थ : [सुण्णज्झाणपइट्ठो] शून्य - निर्विकल्पध्यान में प्रविष्ट, [ससहावसुक्खसंपण्णो] आत्म-सद्भाव के सुख से संपन्न और [परमाणंदे] उत्कृष्ट आनन्द में [थक्को] स्थित [जोई] जोगी [फुडं] स्पष्ट ही [भरियावत्थो] पूर्ण कलश के समान भृतावस्थ - अविनाशीक आत्मानन्द रूपी सुधा से संभृत [हवइ] होता है ।