
जत्थ ण झाणं झेयं झायारो णेव चिंतणं किंपि ।
ण य धारणावियप्पो तं सुण्णं सुट्ठु भाविज्ज ॥78॥
यत्र न ध्यानं ध्येयं ध्यातारो नैव चिंतनं किमपि ।
न च धारणा विकल्पस्तं शून्यं सुट्ठु भावयेः ॥७८॥
ध्यान, ध्येय, ध्याता नहीं, जहाँ न और विकल्प ।
चिन्ता तथा न धारणा, वही ध्यान अविकल्प ॥७८॥
अन्वयार्थ : [जत्थ] जिसमें [ण झाणं झेयं झायारो] न ध्यान है, न ध्येय है, न ध्याता है अर्थात् जो इन तीनों के विकल्प से रहित है, जिसमें [किंपि चिंतणं णेव] किसी प्रकार का चिन्तन नहीं है [य] और [ण धारणावियप्पो] न जिसमें पार्थिवी, आग्नेयी, वायवी और वारुणी धारणाओं का विकल्प है अथवा जिसमें धारणा - कालान्तर में किसी तत्त्व को विस्मृत न होना तथा विकल्प - असंख्यात लोक प्रमाण विकल्प नहीं है [तं] उसे [सुट्ठु] अच्छी तरह [सुण्णं] शून्य ध्यान [भाविज्ज] समझो ।