
जो खलु सुद्धो भावो सो जीवो चेयणावि सा उत्ता ।
तं चेव हवदि णाणं दंसणचारित्तयं चेव ॥79॥
यः खलु शुद्धो भावः स जीवश्चेतनापि सा उक्ता ।
तच्चैव भवति ज्ञानं दर्शनचारित्रं चैव ॥७९॥
शुद्ध भाव मय जीव जो, उसे चेतना जान ।
वही चेतना सर्वथा, दर्शन-ज्ञान प्रमाण ॥७९॥
अन्वयार्थ : [खलु] निश्चय से [जो सुद्धो भावो] शुद्धभाव है [सो जीवो] वह जीव है, [सा चेयणावि उत्ता] वही चेतना कही गई है [तं चेव णाणं हवदि] वही ज्ञान है और वही [दंसणचारित्तयं चेव] दर्शन तथा चारित्र है ।