+ शुद्ध-भाव ही रत्नत्रय -
दंसणणाणचरित्ता णिच्छयवाएण हुंति ण हु भिण्णा ।
जो खलु सुद्धो भावो तमेव रयणत्तयं जाण ॥80॥
दर्शनज्ञानचारित्राणि निश्चयवादेन भवंति न हि भिन्नानि ।
यः खलु शुद्धो भावस्तमेव रत्नत्रयं जानीहि ॥८०॥
दर्शन, ज्ञान, चरित्र में, निश्चय से एकत्व ।
शुद्ध-चेतना भाव ही, रत्नत्रयी पवित्र ॥८०॥
अन्वयार्थ : [णिच्छयवाएण] निश्चय की अपेक्षा [हु] वास्तव में [दंसणणाणचरित्ता] दर्शन, ज्ञान और चारित्र [भिण्णा ण हुंति] भिन्न नहीं हैं । [खलु] निश्चय से [जो सुद्धो भावो] जो शुद्धभाव है [तमेव] उसे ही [रयणत्तयं] रत्नत्रय [जाण] जानो ।