
तत्तियमओ हु अप्पा अवसेसालंबणेहि परिमुक्को ।
उत्तो स तेण सुण्णो णाणीहि ण सव्वहा सुण्णो ॥81॥
तत्त्रिकमयो हि आत्मा अवशेषालंबनैः परिमुक्तः ।
उक्तः स तेन शून्यो ज्ञानिभिर्न सर्वथा शून्यः ॥८१॥
तत् त्रिक मय है आत्मा, सकल विभाव वियुक्त ।
इससे शून्य कहा इसे, नहिं अभावता युक्त ॥८१॥
अन्वयार्थ : [हु] निश्चय से [तत्तियमओ] रत्नत्रय से तन्मय आत्मा [अवसेसालंबणेहिं] राग-द्वेषादि समस्त आलम्बनों से रहित है [तेण] उस कारण [णाणीहि] ज्ञानी जनों के द्वारा [स] वह [सुण्णो] शून्य [उत्तो] कहा गया है [सव्वहा] सब प्रकार से [सुण्णो ण] शून्य नहीं है ।