+ निर्विकल्प ध्यान से सिद्धि -
लवणव्व सलिलजोए झाणे चित्तं विलीयए जस्स ।
तस्स सुहासुहडहणो अप्पाअणलो पयासेइ ॥84॥
लवणमिव सलिलयोगे ध्याने चित्तं विलीयते यस्य ।
तस्य शुभाशुभदहन आत्मानलः प्रकाशयति ॥८४॥
चित्त ध्यान में लीन हो, जल में लवण-समान ।
जलें शुभाशुभ कर्म सब, है चिद्वह्नि महान ॥८४॥
अन्वयार्थ : [सलिलजोए] पानी के योग में [लवणव्व] नमक के समान [जस्स] जिसका [चित्तं] चित्त [झाणे] ध्यान में [विलीयए] विलीन हो जाता है [तस्स] उस मुनि के [सुहासुहडहणो] शुभ-अशुभ कर्मों को जलाने वाली [अप्पाअणलो] आत्मा रूपी अग्नि [पयासेइ] प्रकट होती है ।