
उव्वसिए मणगेहे णट्ठे णीसेसकरणवावारे ।
विप्फुरिए ससहावे अप्पा परमप्पओ हवइ ॥85॥
उद्वसिते मनोगेहे नष्टे निःशेषकरणव्यापारे ।
विस्फुरिते स्वसद्भावे आत्मा परमात्मा भवति ॥८५॥
शून्य बने मन-गेह जब, अक्ष क्रिया हो नष्ट ।
आतम तब परमात्मा, प्रकटित हो निज इष्ट ॥८५॥
अन्वयार्थ : [मणगेहे] मन रूपी घर के [उव्वसिए] ऊजड़ होने पर [णीसेसकरणवावारे] समस्त इन्द्रियों का व्यापार [णट्ठे] नष्ट हो जाने पर और [ससहावे] स्वकीय स्वभाव को [विप्फुरिए] प्रकट होने पर [अप्पा] आत्मा [परमप्पओ] परमात्मा [हवइ] होता है ।