
इयएरिसम्मि सुण्णे झाणे झाणिस्स वट्टमाणस्स ।
चिरबद्धाण विणासो हवइ सकम्माण सव्वाणं ॥86॥
इत्येतादृशे शून्ये ध्याने ध्यानिनो वर्तमानस्य ।
चिरबद्धानां विनाशो भवति स्वकर्मणां सर्वेषाम् ॥८६॥
निर्विकल्प इस ध्यान में, जिस ध्यानी का वास ।
दीर्घ बद्ध उस जीव के, होते कर्म विनाश ॥८६॥
अन्वयार्थ : [इयएरिसम्मि] इसप्रकार के [सुण्णे] शून्य [झाणे] ध्यान में [वट्टमाणस्स] स्थित [झाणिस्स] ध्याता के [चिरबद्धाण] चिरकाल से बँधे हुए [सव्वाणं सकम्माण] समस्त अपने कर्मों का [विणासो] विनाश [हवइ] होता है ।