
णीसेसकम्मणासे पयडेइ अणंतणाणचउखंधं ।
अण्णेवि गुणा य तहा झाणस्स ण दुल्लहं किंपि ॥87॥
निःशेषकर्मनाशे प्रकटयत्यनंतज्ञानचतुःस्कंधं ।
अन्येऽपि गुणाश्च तथा ध्यानस्य न दुर्लभं किंचिदपि ॥८७॥
कर्मनाश से हो प्रकट, ज्ञानादिक गुण चार ।
तथा और भी हों प्रकट, सुलभ ध्यान से सार ॥८७॥
अन्वयार्थ : [णीसेसकम्मणासे] समस्त कर्मों का नाश होने पर [अणंतणाणचउखंधं] अनन्तज्ञानादि चतुष्टय प्रकट होता है [तहा अण्णेवि गुणा] तथा अन्य गुण भी प्रकट होते हैं । सो ठीक ही है, क्योंकि [झाणस्स] ध्यान के लिए [किंपि] कुछ भी [दुल्लहं] दुर्लभ [ण] नहीं है ।