
जाणइ पस्सइ सव्वं लोयालोयं च दव्वगुणजुत्तं ।
एयसमयस्स मज्झे सिद्धो सुद्धो सहावत्थो ॥88॥
जानाति पश्यति सर्वे लोकालोकं च द्रव्यगुणयुक्तं ।
एकसमयस्य मध्ये सिद्धः शुद्धः स्वभावस्थः ॥८८॥
लोकालोक समस्त निज, गुण-पर्याय प्रयुक्त ।
जाने, देखे समय में, उन्हें सिद्ध स्वात्मस्थ ॥८८॥
अन्वयार्थ : [सुद्धो] शुद्ध और [सहावत्थो] स्वभाव में स्थित [सिद्धो] सिद्ध भगवान [एयसमयस्स मज्झे] एक समय के बीच [दव्वगुणजुत्तं] द्रव्य और गुण से युक्त [सव्वं लोयालोयं च] समस्त लोक और अलोक को [जाणइ पस्सइ] जानते-देखते हैं ।