+ आराधना से सिद्धि -
एवं णाऊणं आराहउ पवयणस्स जं सारं ।
आराहणचउखंधं खवओ संसारमोक्खट्ठं ॥90॥
इति एवं ज्ञात्वा आराधयतु प्रवचनस्य यत्सारं ।
आराधनाचतुःस्कन्धं क्षपकः संसारमोक्षार्थ् ॥९०॥
चतुराराधन साधना, है प्रवचन का सार ।
आराधे इनको क्षपक, हो जिससे भव पार ॥९०॥
अन्वयार्थ : [इय एवं णाऊणं] इसे इस तरह जान कर [खवओ] क्षपक [संसारमोक्खट्ठं] संसार से मोक्ष प्राप्त करने के लिए [जं पवयणस्स सारं] जो आगम का सार है [तं] उस [आराहणचउखंधं] आराधना चतुष्टय की [आराहउ] आराधना करे ।