
धण्णा ते भयवंता अवसाणे सव्वसंगपरिचाए ।
काऊण उत्तमट्ठं सुसाहियं णाणवंतेहिं ॥91॥
धन्यास्ते भगवंतः अवसाने सर्वसंगपरित्यागं ।
कृत्वा उत्तमार्थं सुसाधितं ज्ञानवद्भिः ॥९१॥
धन्य सदा भगवान वे, तजकर जगत पदार्थ ।
साधा अन्तिम काल में, उत्तम आत्मपदार्थ ॥९१॥
अन्वयार्थ : जिन [णाणवंतेहिं] ज्ञानवान जीवों ने [अवसाणे] जीवन के अन्त में [सव्वसंगपरिचाए] समस्त परिग्रह का त्याग [काऊण] कर [उत्तमट्ठं] मोक्ष अथवा समाधिमरण को [सुसाहियं] अच्छी तरह सिद्ध कर लिया है [ते] वे [धण्णा] धन्य हैं और [भयवंता] जगत्पूज्य हैं ।