
धण्णोसि तुं सुज्जस लहिऊणं माणुसं भवं सारं ।
कयसंजमेण लद्धं सण्णासे उत्तमं मरणं ॥92॥
धन्योऽसि त्वं सद्यशः लब्ध्वा मानुषं भवं सारम् ।
कृतसंयमेन लब्धं संन्यासे उत्तमं मरणं ॥९२॥
धन्य धन्य! तुम हो क्षपक, पाकर नर-भव सार ।
तन तजकर संन्यास से, करो आत्म उद्धार ॥९२॥
अन्वयार्थ : [सुज्जस] हे निर्मल यश के धारक क्षपक ! [सारं] श्रेष्ठ [माणुसं भवं] मनुष्य भव को [लहिऊणं] प्राप्त कर [कयसंजमेण] संयम धारण करते हुए तुमने [सण्णासे] संन्यास में [उत्तमं मरणं] उत्तम मरण [लद्धं] प्राप्त किया है, इसलिए [तुं] तुम [धण्णोसि] धन्य हो, पुण्यशाली हो ।