+ क्षपक को काय-जनित दुःख -
किसिए तणुसंघाए चिट्ठारहियस्स विगयधामस्स ।
खवयस्स हवइ दुक्खं तक्काले कायमणुहूयं ॥93॥
कृषिते तनुसंघाते चेष्टारहितस्य विगतस्थानः ।
क्षपकस्य भवति दुःखं तत्काले कायमन उद्भूतम् ॥९३॥
होते ही कृश देह के, करे न वह कुछ काम ।
व्यथित न हो मुनि उस समय, सँभाले परिणाम ॥९३॥
अन्वयार्थ : [तक्काले] संन्यास के समय [तणुसंघाए] शरीर का संघटन [किसिए] कृश होने पर [विगयधामस्स] निर्बल एवं [चिट्ठारहियस्स] चेष्टा रहित [खवयस्स] क्षपक को [कायमणुहूयं] काय और वचन से उत्पन्न होने वाला [दुक्खं] दुःख [हवइ] होता है ।