+ शयन के दुःख को सहने की प्रेरणा -
जइ उप्पज्जइ दुक्खं कक्कससंथारगहणदोसेण ।
खीणसरीरस्स तुमं सहतं समभावसंजुत्तो ॥94॥
यद्युत्पद्यते दुःखं कर्कशसंस्तरग्रहणदोषेण ।
क्षीणशरीरस्य त्वं सहस्व समभावसंयुक्तः॥९४॥
कर्कश संस्तर ग्रहण से, होता हो यदि कष्ट ।
सहन करे तनु-क्षीण यति, धर समभाव विशिष्ट ॥९४॥
अन्वयार्थ : हे क्षपक ! [खीणसरीरस्स] क्षीण शरीर को धारण करने वाले तुम्हें [जइ] यदि [कक्कससंथारगहणदोसेण] कठोर संथारे के ग्रहण रूप दोष से [दुक्खं] दुःख [उप्पज्जइ] उत्पन्न होता है तो [तुं] तुम उसे [समभावसंजुत्तो] समभाव से युक्त होकर [सहतं] सहन करो ।