+ परीषह सहन से कर्मों का क्षय -
तं सुगहियसण्णासे जावक्कालं तु वससि संथारे ।
तण्हाइदुक्खतत्तो णियकम्मं ताव णिज्जरसि ॥95॥
त्वं सुगृहीतसंन्यासो यावत्कालं तु वससि संस्तरे ।
तृष्णादिदुःखतप्तो निजकर्म तावन्निर्जरयसि ॥९५॥
हे समाधि साधक मुने, जब तक संस्तर वास ।
वहाँ तृषादिक कष्ट जो, करे कर्म वह नाश ॥९५॥
अन्वयार्थ : हे क्षपक ! [तं] तुम [सुगहियसण्णासे] संन्यास ग्रहण कर [जावक्कालं] जब तक [संथारे वससि] संथारे पर निवास करते हो [ताव] तब तक [तण्हाइदुक्खतत्तो] तृषा आदि के दुःख से संतप्त होते हुए [णियकम्मं] अपने कर्म की [णिज्जरसि] निर्जरा करते हो ।