+ क्षुधा परीषह सहन से कर्म निर्जरा -
जहं जहं पीडा जायइ भुक्खाइपरीसहेहिं देहस्स ।
तहं तहं गलंति णूणं चिरभवबद्धाणि कम्माइं ॥96॥
यथा यथा पीडा जायते क्षुदादिपरीषहैर्देहस्य ।
तथा तथा गलंति नूनं चिरभवबद्धानि कर्माणि ॥९६॥
क्षुधा परीषह आदि से, हो पीड़ा उत्पन्न ।
चिर भव संचित कर्म सब, उससे होते भिन्न ॥९६॥
अन्वयार्थ : [जहं जहं] जिस-जिस प्रकार [भुक्खाइपरीसहेहिं] क्षुधा आदि परीषहों के द्वारा [देहस्स] शरीर को [पीड़ा] तीव्रतर वेदना [जायइ] उत्पन्न होती है [तहं तहं] उसी-उसी प्रकार क्षपक के [चिरभवबद्धाणि] चिर काल से अनेक भावों में बँधे हुए [कम्माइं] कर्म [णूणं] निश्चित ही [गलंति] गल जाते हैं, नष्ट हो जाते हैं ।