+ कर्मोदय से चारों गतियों में पाए दुखों का स्मरण -
तत्तोहं तणुजोए दुक्खेहिं अणोवमेहिं तिव्वेहि ।
णरसुरणारयतिरिए जहा जलं अग्गिजोएण ॥97॥
तप्तोऽहं तनुयोगे दुःखैरनुपमैस्तीव्रैः ।
नरसुरनारकतिरश्चि यथा जलमग्नियोगेन ॥९७॥
गतियों में तनु योग से, हुआ दुःखों से तप्त ।
अग्नि योग से नीर ज्यों, होता है संतप्त ॥९७॥
अन्वयार्थ : [अग्गिजोएण] अग्नि के योग से [जलं जहा] जल के समान [अहं] मैं [तणुजोए] शरीर का संयोग होने पर [तिव्वेहि] तीव्र तथा [अणोवमेहिं] अनुपम [दुक्खेहिं] दुःखों के द्वारा [णरसुरणारयतिरिए] मनुष्य, देव, नारकी और तिर्यंच गति में [तत्तो] संतप्त हुआ हूँ ।