
ण गणेइ दुक्खसल्लं इयभावणभाविओ फुडं खवओ ।
पडिवज्जइ ससहावं हवइ सुही णाणा सुक्खेण ॥98॥
न गणयति दुःखशल्यं इतिभावनाभावितः स्फुटं क्षपकः ।
प्रतिपद्यते स्वस्वभावं भवति सुखी ज्ञानसौख्येन ॥९८॥
ज्ञान भावना युक्त ॠषि, गिने न दुःख को लेश ।
पाता आत्मस्वभाव को, होता सुखी विशेष ॥९८॥
अन्वयार्थ : [इयभावणभाविओ] इसप्रकार की भावना से सुसंस्कृत [खवओ] क्षपक [फुडं] स्पष्ट ही [दुक्खसल्लं] दुःख रूपी शल्य को [ण गणेइ] कुछ नहीं गिनता है [ससहावं] अपने स्वभाव को [पडिवज्जइ] प्राप्त होता है और [णाणासुक्खेण] भेदज्ञान जनित सुख से [सुही] सुखी [हवइ] होता है ।