+ पर-भाव से विरक्त हो निज में लीन रहने की प्रेरणा -
भित्तूण रायदोसे छित्तूण य विसयसंभवे सुक्खे ।
अगणंतो तणुदुक्खं 2झायस्स णिजप्पयं खवया ॥99॥
भित्वा रागद्वेषौ छित्वा च विषयसंभवानि सुखानि ।
अगणयंत तनुदुःखं ध्यायस्व निजात्मानं क्षपक ॥९९॥
राग-द्वेष को भेद कर, विषय-सुखों को छोड़ ।
क्षपक न तनु दुःख मान तू, निज में निज को जोड़ ॥९९॥
अन्वयार्थ : [खवया] हे क्षपक ! तुम [रायदोसे] राग.द्वेष को [भित्तूण] भेद कर [य] तथा [विसयसंभवे] विषयों से उत्पन्न होने वाले [सुक्खे] सुखों को [छित्तूण] छेद कर [तणुदुक्खं] शरीर के दुःख को [अगणंतो] कुछ नहीं गिनते हुए [णिजप्पयं] स्वकीय आत्मा का [झायस्स] ध्यान करो ।