+ आत्मा को तप द्वारा कर्म से मुक्ति -
जाव ण तवग्गितत्तं सदेहमूसाइं णाणपवणेण ।
ताव ण चत्तकलंकं जीवसुवण्णं खु णिव्वडइ ॥100॥
यावन्न तपोऽग्नितप्तं स्वदेहमूषायां ज्ञानपवनेन ।
तावन्न त्यक्तकलंकं जीवसुवर्णं हि निर्व्यक्तीभवति ॥१००॥
ज्ञान पवन से देह में, जलती जब तप-ज्वाल ।
चेतन-सोना शुद्ध हो, तज कलंक तत्काल ॥१००॥
अन्वयार्थ : [खु] निश्चय से [जाव] जब तक [जीवसुवण्णं] आत्मा रूपी सुवर्ण [सदेहमूसाइं] अपने शरीर रूपी साँचे [मूस] के भीतर [णाणपवणेण] ज्ञान रूपी वायु द्वारा [तवग्गितत्तं] तप रूपी अग्नि से संतप्त [ण] नहीं होता [ताव] तब तक [चत्तकलंकं] कर्म रूपी
कालिमा से रहित [ण णिव्वडइ] नहीं निकलता / होता ।