+ मैं देह-मन नहीं अत: मुझे दुःख नहीं -
णाहं देहो ण मणो ण तेण मे अत्थि इत्थ दुक्खाइं ।
समभावणाइ जुत्तो विसहसु दुक्खं अहो खवय ॥101॥
नाहं देहो न मनो न तेन मे सन्ति अत्र दुःखानि ।
समभावनया युक्तः विसहस्व दुःखमहो क्षपक॥१०१॥
नहीं देह मैं मन नहीं, मुझे न है दुःख लेश ।
यों मुनि समता भाव से, सभी सहें दुःख क्लेश ॥१०१॥
अन्वयार्थ : [अहं] मैं [देहो ण] शरीर नहीं हूँ [मणो ण] मन नहीं हूँ [तेण] इसलिए [इत्थ दुक्खाइं] शरीर और मन में होने वाले दुःख [मे ण अत्थि] मेरे नहीं होते । [समभावणाइ जुत्तो] इसप्रकार की समभावना से युक्त होते हुए [अहो खवय] हे क्षपक ! [दुक्खं विसहसु] दुःख सहन करो ।