
ण य अत्थि कोवि वाही ण य मरणं अत्थि मे विसुद्धस्स ।
वाही मरणं काए तम्हा दुक्खं ण मे अत्थि ॥102॥
न चास्ति कोऽपि व्याधिर्न च मरणं अस्ति मे विशुद्धस्य ।
व्याधिर्मरणं काये तस्मात् दुःखं न मे अस्ति ॥१०२॥
मैं विशुद्ध चैतन्य हूँ, मुझमें मरण न व्याधि ।
मरण-व्याधि है काय के, मुझे न दुःख-उपाधि ॥१०२॥
अन्वयार्थ : [विसुद्धस्स] विशुद्ध स्वभाव को धारण करने वाले मेरे लिए [ण कोवि वाही अत्थि] न कोई शारीरिक पीड़ा है [ण य मरणं अत्थि] और न मेरा मरण है [वाही मरणं] शारीरिक पीड़ा और मरण तो [काए] शरीर में हैं [तम्हा] इसलिए [मे दुक्खं ण अत्थि] मुझे दुःख नहीं है ।