
सुक्खमओ अहमेक्को सुद्धप्पा णाणदंसणसमग्गो ।
अण्णे जे परभावा ते सव्वे कम्मणा जणिया ॥103॥
सुखमयोऽहमेकः शुद्धात्मा ज्ञानदर्शनसमग्रः ।
अन्ये ये परभावास्ते सर्वे कर्मणा जनिताः ॥१०३॥
शुद्ध, एक मैं हूँ सुखी, दृग, अवगम भरपूर ।
कर्म-जनित परभाव जो, वे सब मुझसे दूर ॥१०३॥
अन्वयार्थ : [अहं] मैं [सुक्खमओ] सुखमय [एक्को] एक [सुद्धप्पा] शुद्धात्मा तथा [णाणदंसणसमग्गो] ज्ञान-दर्शन में परिपूर्ण हूँ [अण्णे जे परभावा] अन्य जो
परभाव हैं [ते सव्वे] वे सब [कम्मणा जणिया] कर्म से उत्पन्न हैं ।