+ मैं नित्य, सुख-स्वभावी, अरूपी, चिद्रूपी -
णिच्चो सुक्खसहावो जरमरणविवज्जिओ सयारूवी ।
णाणी जम्मणरहिओ 1इक्कोहं केवलो सुद्धो ॥104॥
नित्यः सुखस्वभावः जरामरणविवर्जितः सदारूपी ।
ज्ञानी जन्मरहितः एकोऽहं केवलः शुद्धः ॥१०४॥
जन्म-मरण वर्जित सदा, सुखमय, नित्य, अरूप ।
जरा रहित, ज्ञानी, विमल, मैं केवल चिद्रूप ॥१०४॥
अन्वयार्थ : क्षपक को ऐसी भावना करनी चाहिए कि [अहं] मैं [णिच्चो] नित्य हूँ [सया] सर्वदा [सुक्खसहावो] सुख स्वभाव वाला हूँ [जरमरणविवज्जिओ] जरा और मरण से रहित हूँ [सयारूवी] हमेशा अरूपी हूँ [णाणी] ज्ञानी हूँ [जम्मणरहिओ] जन्म से रहित हूँ [इक्कोहं] एक हूँ [केवली] पर की सहायता से रहित हूँ और [सुद्धो] शुद्ध हूँ ।