+ इस भावना के साथ शरीर से आत्मा को पृथक करो -
इय भावणाइं जुत्तो अवगण्णिय देहदुक्खसंघायं ।
जीवो देहाउ तुमं कड्ढसु खग्गुव्व कोसाओ ॥105॥
इति भावनया युक्तः अवगणय्य देहदुःखसंघातम् ।
जीवं देहात्त्वं निष्कासय खङ्गमिव कोशात् ॥१०५॥
कर ऐसी सद्भावना, देह-दुःख मत मान ।
तन से चेतन भिन्न कर, जैसे कोश-कृपाण ॥१०५॥
अन्वयार्थ : [इय भावणाइं] ऐसी भावना से [जुत्तो] युक्त होकर [तुं] तुम [देह दुक्खसंघायं] शरीर सम्बन्धी दुःखों के समूह की [अवगण्णिय] उपेक्षा कर
[जीवो] जीव को [देहाउ] शरीर से [कोसाओ] म्यान से [खग्गुव्व] तलवार की तरह [कड्ढसु] पृथक् निकालो ।