
हणिऊण अट्टरुद्दे अप्पा परमप्पयम्मि ठविऊण ।
भावियसहाउ जीवो कड्ढसु देहाउ मलमुत्तो ॥106॥
हत्त्वार्तरौद्रौ आत्मानं परमात्मनि स्थापयित्वा ।
भावितस्वभाव जीवं निष्कासय मलमुक्तम् ॥१०६॥
आत्म-तत्त्व में हो सुदृढ़, आर्त्त-रौद्र को छोड़ ।
आत्म-भाव धारक क्षपक, तन से निज को मोड़ ॥१०६॥
अन्वयार्थ : [भावियसहाउ] हे स्वभाव की भावना करने वाले क्षपक ! [अट्टरुद्दे] आर्त और रौद्रध्यान को [हणिऊण] नष्ट कर [अप्पा] आत्मा को [परमप्पयम्मि] परमात्मा में [ठविऊण] लगाकर [मलमुत्तो जीवो] निर्मल जीव को [देहाउ] शरीर से [कड्ढसु] पृथक् करो ।