
कालाई लहिऊणं छित्तूण य अट्ठकम्मसंखलयं ।
केवलणाणपहाणा भविया सिज्झंति तम्मि भवे ॥107॥
कालादिलब्ध्वा छित्वा च अष्टकर्मशृंखलाम् ।
केवलज्ञानप्रधाना भव्या सिध्यंति तस्मिन् भवे ॥१०७॥
पाकर के कालादि को, छेद कर्म-जंजीर ।
होकर केवलज्ञानमय, भव्य तिरें भव नीर ॥१०७॥
अन्वयार्थ : [भविया] भव्य जीव [कालाई लहिऊणं] काल आदि लब्धियों को प्राप्त कर [य] तथा [अट्ठकम्मसंखलयं] आठ कर्मों की शृंखला को [छित्तूण] छेदकर [केवलणाणपहाणा] केवलज्ञान से युक्त होते हुए [तम्मि भवे] उसी भव में [सिज्झंति] सिद्ध हो जाते हैं ।