+ कर्म शेष रह जाने पर स्वर्गों में वास -
आराहिऊण केइ चउव्विहाराहणाइं जं सारं ।
उव्वरियसेसपुण्णा सव्वट्ठणिवासिणो हुंति ॥108॥
आराध्य केचित् चतुर्विधाराधनायां यं सारं ।
उद्वृत्तशेषपुण्याः सर्वार्थनिवासिनो भवंति ॥१०८॥
पाप-कर्म के उदय से, हो दुर्गति में त्रास ।
बचे हुए कुछ पुण्य से, हो स्वर्गादि निवास ॥१०८॥
अन्वयार्थ : [उव्वरियसेसपुण्णा] जिनकी पुण्य प्रकृतियाँ नष्ट होने से शेष बची हैं, ऐसे [केई] कोई आराधक [चउव्विहाराहणाइं जं सारं] चार प्रकार की आराधनाओं में जो श्रेष्ठ है, उस शुद्ध बुद्ध स्वभाव परमात्मा की [आराहिऊण] आराधना करके [सव्वट्ठणिवासिणो] सर्वार्थसिद्धि में निवास करने वाले [हुंति] होते हैं ।