
जेसिं हुंति जहण्णा चउव्विहाराहणा हु खवयाणं ।
सत्तट्ठभवे गंतुं तेवि य पावंति णिव्वाणं ॥109॥
येषां भवंति जघन्या चतुर्विधाराधना हि क्षपकानाम् ।
सप्ताष्टभवान् गत्वा तेऽपि च प्राप्नुवंति निर्वाणम् ॥१०९॥
है जघन्य आराधना, उसको इस विध जान ।
धर कर वे सप्ताष्ट भव, पाते हैं निर्वाण ॥१०९॥
अन्वयार्थ : [हु] निश्चय से [जेसिं] जिन [खवयाणं] क्षपकों के [जहण्णा चउव्विहाराहणा] चार प्रकार की जघन्य आराधनाएँ [हुंति] होती हैं [तेवि य] वे भी [सत्तट्ठभवे] सात-आठ भव [गत्वा] व्यतीत कर [णिव्वाणं पावंति] निर्वाण को प्राप्त होते हैं ।