
उत्तमदेवमणुस्से सुक्खाइं अणोवमाइं भुत्तूण ।
आराहणउवजुत्ता भविया सिज्झंति झाणट्ठा ॥110॥
उत्तमदेवमानुषेषु सुखान्यनुपमानि भुक्त्वा ।
आराधनोपयुक्ता भव्याः सिध्यंति ध्यानस्थाः ॥११०॥
अमर, मनुज गति के मधुर, अनुपम, सुख को भोग ।
आराधक ध्यानस्थ जन, होते सिद्ध, अयोग ॥११०॥
अन्वयार्थ : [आराहणउवजुत्ता] आराधना में उपयुक्त तथा [झाणट्ठा] ध्यान में स्थित [भविया] भव्यजीव [उत्तमदेव मणुस्से] उत्तम देव और मनुष्यों में [अणोवमाइं] अनुपम [सुक्खाइं] सुख [भुत्तूण] भोग कर [सिज्झंति] सिद्ध होते हैं ।