+ आत्म-ध्यान से रहित को तप द्वारा भी मुक्ति नहीं -
अइ कुणउ तवं पालेउ संजमं पढउ सयलसत्थाइं ।
जाम ण झावइ अप्पा ताम2ण मोक्खो जिणो भणइ ॥111॥
अति करोतु तपः पालयतु संयमं पठतु सकलशास्त्राणि ।
यावन्न ध्यायत्यात्मानं तावन्न मोक्षो जिनो भणति ॥१११॥
संयम पाले तप तपे, करे शास्त्र-अभ्यास ।
आत्मध्यान बिन, जिन करें, नहीं मुक्ति में वास ॥१११॥
अन्वयार्थ : प्राणी [अइ तवं कुणउ] अत्यन्त तप करे, [संजमं पालेउ] संयम का पालन करे और [सयल सत्थाइं पढउ] समस्त शास्त्रों को पढ़े, किन्तु [जाम] जब तक [अप्पा ण झावइ] आत्मा का ध्यान नहीं करता है [ताम] तब तक [मोक्खो] मोक्ष नहीं होता ऐसा [जिणो भणइ] जिनेन्द्र भगवान कहते हैं ।