
चइऊण सव्वसंगं लिंगं धरिऊण जिणवरिंदाणं ।
अप्पाणं झाऊणं भविया सिज्झंति णियमेण ॥112॥
त्यक्त्वा सर्वसंगं लिंगं धृत्वा जिनवरेंद्राणाम् ।
आत्मानं ध्यात्वा भव्याः सिध्यंति नियमेन ॥११२॥
सर्व परिग्रह त्याग कर, धर जिनेन्द्र का वेश ।
ध्याता निज चैतन्य मुनि, पाता सिद्धि अशेष ॥११२॥
अन्वयार्थ : [भविया] भव्यजीव [सव्वसंगं] सर्व परिग्रह को [चइऊण] छोड़कर [जिणवरिंदाणं] जिनेन्द्र भगवान का [लिंगं] दिगम्बर वेष [धरिऊण] धारण कर तथा [अप्पाणं झाऊण] आत्मा का ध्यान कर [णियमेण] नियम से [सिज्झंति] सिद्ध होते हैं ।