
आराहणाइ सारं उवइट्ठं जेहिं मुणिवरिंदेहिं ।
आराहियं च जेहिं ते सव्वेहं पवंदामि ॥113॥
आराधनायां सारमुपदिष्टं यैर्मुनिवरेन्द्रैः ।
आराधितं च यैस्तान् सर्वानहं प्रवंदे ॥११३॥
महा मुनीन्द्रों ने कहा, यह आराधन सार ।
आराधा जिसने इन्हें, वन्दन उन्हें अपार ॥११३॥
अन्वयार्थ : [जेहिं मुणिवरिंदेहिं] जिन मुनिराजों ने [आराहणाइसारं] आराधनासार का [उवइट्ठं] उपदेश दिया है [च] और [जेहिं] जिन मुनिराजों ने [आराहियं] उसकी आराधना की है [ते सव्वे] उन सब की [अहं] मैं [पवंदामि] वन्दना करता हूँ ।