शोच्यन्ते स्वजनं मूर्खा: स्वकर्मफलभोगिनम्‌ ।
नात्मानं बुद्धिविध्वंसा यमदंष्ट्रान्तरस्थितम्‌ ॥5॥
अन्वयार्थ : यदि अपना कोई कुटुंबीजन अपने कर्मवशात्‌ मरण को प्राप्त हो जाता है, तो नष्ट बुद्धि मूर्खजन उसका शोक करते हैं, परन्तु आप स्वयं यमराज की दाढ़ों में आया हुआ है, इसकी चिंता कुछ भी नहीं करता है ! यह बड़ी मूर्खता है ।

  वर्णीजी 




loading