
शरीरमेतदादाय त्वया दु:खं विसह्यते ।
जन्मन्यस्मिंस्ततस्तद्धि नि:शेषानर्थमन्दिरम् ॥10॥
अन्वयार्थ : हे आत्मन्! इस संसार में तूने इस शरीर को ग्रहण करके दु:ख पाये व सहे हैं इसी से तू निश्चय कर जान कि यह शरीर ही समस्त अनर्थों का घर है, इसके संसर्ग से सुख का लेश भी न मान ॥१०॥
वर्णीजी