
यत्र भावा विलोक्यन्ते ज्ञानिभिश्चेतनेतरा: ।
जीवादय: स लोक: स्यात्ततोऽलोको नभ: स्मृत: ॥1॥
अन्वयार्थ : जितने आकाश में जीवादिक चेतन-अचेतन पदार्थ ज्ञानी पुरुषों ने देखे हैं, सो तो लोक है। उसके बाह्य जो केवल मात्र आकाश है, उसे अलोक व अलोकाकाश कहते हैं ॥१॥
वर्णीजी