+ अब आत्महित को जानने वाले के गुण कहते हैं- -
जाणंतस्सादहिदं अहिदणियत्ती हिदपवत्ती य ।
होदि य तो से तम्हा आदहिदं आगमेदव्वं॥105॥
आतम-हित का ज्ञाता हित में वर्ते रहे अहित से दूर ।
अतः आत्महित कैसे हो यह कला सीख लेना भरपूर॥105॥
अन्वयार्थ : आत्महित जानने वाले की हित में प्रवृत्ति और अहित से निवृत्ति होती है, इसलिए आत्महित सीखने योग्य है ।

  सदासुखदासजी