
सज्झायं कुव्वंतो पंचेंदियसंवुडो तिगुत्तो य ।
हवदि य एयग्गमणो विणयेण समाहिदो भिक्खू॥106॥
स्वाध्याय करने वाले को इन्द्रिय संवर, गुप्ति तीन ।
मन होता एकाग्र, विनय से रुकता कर्मागमन नवीन॥106॥
अन्वयार्थ : स्वाध्याय करने वाले साधु के पाँचों इन्द्रियों का संवर होता है । स्वयं स्पर्श, रस, गंध, रूप, शब्द पाँच प्रकार के विषय रुक जाते हैं तथा मन, वचन, काय - ये तीन गुप्तियाँ होती हैं, मन की एकाग्रता युक्त होते हैं, विनय युक्त होते हैं । अत: स्वाध्याय से ही इन्द्रियों एवं मन-वचन-काय के द्वारा कषायों के द्वारा आने वाले कर्म रुक जाते हैं । इसलिए बडा/ बहुत संवर होता है ।
सदासुखदासजी