+ आगे स्वाध्याय से नवीन-नवीन संवेग की उत्पत्ति का अनुक्रम कहते हैं- -
जह जह सुदमोग्गाहदि अदिसयरसपसरमसुदपुव्वं तु ।
तह तह पल्हादिज्जदि णवणवसंवेगसड्ढाए॥107॥
ज्योंज्यों श्रुत काअवगाहन होअतिशयरसपरिपाकअपूर्व ।
त्यों त्यों अनुपम आनन्द उछले नव-नव हो संवेग अपूर्व॥107॥
अन्वयार्थ : ज्योंं-ज्यों श्रुत में अवगाहन करते हैं, अभ्यास करते हैं, अर्थ का चिंतवन करते हैं, त्यों-त्यों नवीन-नवीन धर्मानुरागरूप संवेग की श्रद्धा करके आनंद को प्राप्त होते हैं । कैसा हैश्रुत? पूर्व में अनंतानंत काल में भी श्रवण नहीं किया और यदि कदाचित् कोई पर्याय में श्रवण भी किया हो तो भी यथार्थ अर्थ के श्रद्धान-अनुभवन-आस्वादन के अभाव से नहीं सुने के तुल्य ही हुआ । और कैसा है श्रुत? अतिशय रूप इसका है फैलाव/विस्तार जिसमें । इससे ज्ञान आत्मा का निजरूप है, इसमें सकल पदार्थ प्रतिबिंबित होते हैं । सो ज्यों-ज्यों, जितना-जितना अनुभव करता है, उतना-उतना अज्ञानभाव के नाश पूर्वक अपूर्व आनंद उछलता है । ऐसे श्रुत का ज्यों-ज्यों अभ्यास करता है, त्यों-त्यों नवीन-नवीन धर्मानुराग तथा संसार-भोग से भयभीतता बढती जाती है । इसलिए नवीन-नवीन संवेग का कारण भी यह जिनेन्द्र के परमागम का सेवन ही है ।

  सदासुखदासजी