
आयापायविदण्हू दंसणणाणतबसंजमे ठिच्चा ।
विहरदि विसुज्झमाणो जावज्जीवं च णिक्कंपो॥108॥
लाभ हानि का ज्ञाता, दर्शन-ज्ञान तथा तप-संयम लीन ।
हो विशुद्ध जो विचरण करता आजीवन निष्कम्प वही॥108॥
अन्वयार्थ : आगम को जानने वाला ही परमागम के अभ्यास से रत्नत्रय की वृद्धि तथा हानि को जानता है और जो रत्नत्रय की हानि-वृद्धि को जानेगा, वही हानि के कारणों का त्यागकर तथा वृद्धि के कारणों को अंगीकार करके, विशुद्धता को प्राप्त होता हुआ दर्शन में, ज्ञान में, तप में, संयम में तिष्ठ कर यावज्जीव निश्चल प्रवर्तता है ।
सदासुखदासजी