
बारसविहम्मि य तवे सब्भंतरवाहिरे कुसलदिठ्ठे ।
ण वि अत्थि ण वि य होहिदि सज्झायसमं तवो कम्मं ॥109॥
कुशल पुरुष द्वारा वर्णित बाह्याभ्यन्तर द्वादश तप में ।
स्वाध्याय-सम नहीं अन्य तप और न आगामी युग में॥109॥
अन्वयार्थ : प्रवीण पुरुष श्री गणधरदेव के द्वारा अवलोकन किये गये बाह्य-अभ्यंतर द्वादश प्रकार के तप, इनमें स्वाध्याय समान तप कभी हुआ नहीं, होगा नहीं, होता नहीं है ।
सदासुखदासजी