जं अण्णाणी कम्मं खवेदि भवसयसहस्सकोडीहिं ।
तं णाणी तिहिं गुत्तो खवेदि अंतोमुहुत्तेण॥110॥
अज्ञानी जिन कमाब को लख-कोटी1 भव में क्षय करता ।
क्षय करता अन्तर्मुहूर्त में ज्ञानी उन्हें त्रिगुप्ति से॥110॥
अन्वयार्थ : सम्यग्ज्ञान रहित अज्ञानी जिस कर्म को लाखों-करोडों भवपर्यंत तपश्चरण करके खिपाता है, उस कर्म को सम्यग्ज्ञानी तीन गुप्तिरूप होकर अन्तर्मुहूर्त में खिपाता है, नाश करता है ।

  सदासुखदासजी